वैदिक ज्योतिष में जन्म कुंडली के बारह भावों में से चतुर्थ भाव को सुख, संपत्ति, भूमि, वाहन व घर का कारक भाव माना जाता है। संपत्ति संबंधी निर्णयों से पहले इस भाव व इसके स्वामी ग्रह की स्थिति देखी जाती है।
चतुर्थ भाव का कारकत्व
चतुर्थ भाव माता, घर, वाहन, स्थायी संपत्ति व मानसिक सुख से जुड़ा होता है। इस भाव का स्वामी ग्रह जिस भाव में बैठा हो, वह संपत्ति संबंधी परिणामों को प्रभावित करता है।
शुभ ग्रह योग
यदि चतुर्थ भाव में गुरु, शुक्र या चंद्रमा जैसे शुभ ग्रह स्थित हों या उनकी दृष्टि हो, तो यह संपत्ति व भूमि लाभ का संकेत माना जाता है। चतुर्थेश का केंद्र या त्रिकोण भाव में होना भी शुभ माना जाता है।
अशुभ प्रभाव के संकेत
यदि चतुर्थ भाव में राहु, शनि या मंगल जैसे ग्रहों की पीड़ादायक स्थिति हो, तो संपत्ति विवाद, कानूनी अड़चन या घर संबंधी परेशानियों की संभावना बढ़ सकती है। ऐसे में विस्तृत कुंडली विश्लेषण आवश्यक होता है।
ध्यान रखने योग्य बातें
- कोई भी संपत्ति लेनदेन करने से पहले कुंडली सहित वास्तु का भी परीक्षण उपयोगी रहता है
- चतुर्थेश की दशा-अंतर्दशा का समय भी देखा जाना चाहिए
- केवल एक भाव के आधार पर निर्णय न लें, संपूर्ण कुंडली का विश्लेषण जरूरी है
ज्योतिषीय संकेत मार्गदर्शन के रूप में सहायक हो सकते हैं, परंतु संपत्ति संबंधी अंतिम निर्णय कानूनी दस्तावेजों की जांच व व्यावहारिक सोच के साथ ही लेना चाहिए।
वास्तु विद् सुनील कुमार आर्यन
इंडस्ट्रियल वास्तु सलाहकार एवं ट्रेनर
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