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नई संसद की त्रिकोणीय वास्तु-योजना और भारत की राजनीति (भाग 1)

शोध-श्रृंखला: भाग 1 — संसद की आकृति और राजनीति  ·  भाग 2 — वृत्त और त्रिकोण की ऊर्जा  ·  भाग 3 — सत्ता का धर्म

भाग 1 का आवरण — वृत्त से त्रिकोण तक: संसद, वास्तु और राजनीति; वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन के साथ पुरानी वृत्ताकार और नई त्रिकोणीय संसद
वृत्त से त्रिकोण तक — भाग 1

रायसीना पहाड़ी के नीचे दो संसद भवन आमने-सामने खड़े हैं। एक गोल, दूसरा तिकोना।

यह फ़र्क़ इतना स्पष्ट है कि हर आदमी की नज़र उस पर जाती है, और पिछले दो साल में इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है — ज़्यादातर जल्दबाज़ी में। इस श्रृंखला में मैं उसी सवाल को धीरे-धीरे खोलना चाहता हूँ।

पहले एक बात साफ़ कर दूँ

इस पूरी श्रृंखला में कहीं यह नहीं कहा गया कि भवन की आकृति चुनाव का परिणाम तय करती है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है और मैं ऐसा दावा नहीं करता। जो आगे लिखा है वह तथ्य और प्रतीक का पाठ है, भविष्यवाणी नहीं।

1997 में मैंने अपना अख़बार शुरू किया था और 2004 तक रिपोर्टिंग की। उन वर्षों में राजनीति को क़रीब से देखा। आज वास्तु पर काम करता हूँ। दोनों काम एक ही अनुशासन माँगते हैं — जो दिखाई दे रहा है और जो सिद्ध हो चुका है, इन दोनों को अलग-अलग खाने में रखना।

आकृति का अंतर, अर्थ का प्रश्न — बाईं ओर वृत्ताकार पुरानी संसद (केंद्र, निरंतरता), दाईं ओर त्रिकोणीय नई संसद (दिशा, बहुध्रुवीयता)
आकृति का अंतर, अर्थ का प्रश्न

वह तथ्य जिस पर किसी की नज़र नहीं गई

बहस हमेशा इस तरह चलती है — पुरानी संसद गोल थी, नई तिकोनी है, इसका क्या अर्थ निकलता है।

पर असली बात यह है कि दोनों भवन त्रिकोणीय भूखंड पर ही बने हैं।

1920 के दशक में नॉर्थ ब्लॉक के नीचे जो ज़मीन काउंसिल हाउस के लिए चुनी गई, वह एक बेढंगा त्रिकोणीय टुकड़ा थी। हर्बर्ट बेकर ने उस त्रिकोण को स्वीकार नहीं किया। पहले एक ‘Y’ आकार का प्रस्ताव आया, जिसे एडविन लुटियंस ने ख़ारिज कर दिया। तब बेकर ने उसी त्रिकोणीय भूखंड के भीतर एक वृत्त बैठा दिया।

सौ साल बाद उसी परिसर में, फिर एक त्रिकोणीय भूखंड पर, बिमल पटेल ने ठीक उलटा निर्णय लिया — उन्होंने भूखंड की आकृति को ही भवन की आकृति बना दिया।

तो सवाल “गोल बनाम त्रिकोण” नहीं है। सवाल यह है कि एक जैसी ज़मीन पर दो वास्तुकारों ने उलटे फ़ैसले क्यों लिए — और शास्त्र त्रिकोणीय भूखंड के बारे में असल में कहता क्या है।

क्या आकृति बदलने से राजनीति बदलती है — 2014 में 282, 2019 में 303 और 2024 में 240 सीटें दर्शाता कार्ड, नीचे चेतावनी कि प्रश्न खुला है, निष्कर्ष नहीं
2014–2024: प्रश्न खुला है, निष्कर्ष नहीं

बेकर का वृत्त एक सोचा-समझा राजनीतिक निर्णय था

यह हिस्सा दिलचस्प है और कम लोग जानते हैं।

बेकर ने वृत्त इसलिए नहीं चुना कि वह सुंदर लगता था। त्रिकोणीय ज़मीन पर वृत्त बैठाने से जगह का उपयोग बेहतर होता था। और भीतर उन्होंने तीनों विधायी कक्ष अर्धवृत्ताकार बनाए — यूरोपीय ढंग पर, ब्रिटिश आयताकार ढंग पर नहीं। उनका तर्क दर्ज है: आमने-सामने बैठने वाला आयताकार सदन दो-दलीय टकराव को बढ़ावा देता है, और उस दौर के भारत में वह साम्प्रदायिक तनाव को हवा दे सकता था। बीच में उन्होंने गुंबददार केंद्रीय कक्ष रखा, जिसे वे “एकजुट भारत का प्रतीक” कहते थे।

यानी सौ साल पहले भी किसी ने माना था कि सदन की ज्यामिति राजनीतिक व्यवहार पर असर डालती है। यह वास्तु का दावा नहीं, दर्ज इतिहास है।

और यह भी दर्ज है कि 1922 में लागत की जाँच के लिए बैठी समिति ने कहा था कि बेकर के गोल नक़्शे ने ख़र्च और निर्माण की कठिनाई, दोनों बहुत बढ़ा दिए। सुंदर निर्णय सस्ता नहीं था।

वास्तु विश्लेषण क्या देखता है — दिशा, ब्रह्मस्थान, प्रवेश और कोण; वृत्ताकार तथा त्रिकोणीय योजना पर उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम अंकित दिशा-चक्र
वास्तु विश्लेषण क्या देखता है

दोनों भवन, संक्षेप में

पुरानी संसद। एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर की योजना। उद्घाटन जनवरी 1927 में, तब नाम था काउंसिल हाउस। व्यास 560 फुट। पहली मंज़िल पर 144 स्तंभों की खुली परिक्रमा। बलुआ पत्थर।

नई संसद। वास्तुकार बिमल पटेल, फ़र्म HCP Design। भूखंड लगभग 64,500 वर्ग मीटर, निर्मित क्षेत्र लगभग 20,866 वर्ग मीटर, चार मंज़िलें, ऊँचाई पुराने भवन के बराबर रखी गई। तीन मुख्य कक्ष — लोकसभा, राज्यसभा और केंद्रीय लाउंज। निर्माण 20 मई 2023 को पूरा हुआ, उद्घाटन 28 मई 2023 को।

आकृति, सत्ता और संकेत — पुरानी संसद से नई संसद तक; वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन के साथ दोनों भवनों की तुलना
आकृति, सत्ता और संकेत

“कोने काट दिए हैं” — इस तर्क में एक गणितीय ग़लती है

नई संसद के बचाव में सबसे आम बात यही कही जाती है: कोने तराश दिए गए हैं, इसलिए त्रिकोण का दोष लागू नहीं होता।

यहाँ ठहरकर सोचिए।

जब आप किसी त्रिकोण का एक कोना काटते हैं, तो उस कोने की जगह एक सीधी रेखा आ जाती है। वह रेखा जहाँ पुरानी दो भुजाओं से मिलती है, वहाँ दो नए कोने बनते हैं। यानी एक कोना हटाने पर आपको दो कोने मिलते हैं। शुद्ध घटा-जोड़: एक गया, दो आए।

तीनों कोनों पर यही करने से 3 कोने जाते हैं और 6 कोने बनते हैं। परिणामी आकृति त्रिभुज नहीं, षट्भुज है।

तो कोने हटे नहीं। कोने दुगुने हो गए, बस उन्हें दिखने में हल्का कर दिया गया। जो तर्क दोष मिटाने के लिए दिया जाता है, वह ज्यामिति की दृष्टि से उलटा पड़ता है।

मैं यहाँ इससे कोई राजनीतिक निष्कर्ष नहीं निकाल रहा। यह केवल गिनती है। पर जब कोई कहे कि “कोने काट दिए, अब कुछ नहीं बचा”, तो उससे पूछा जाना चाहिए कि गिनती किसने की।

वृत्त और त्रिकोण का अंतर — वृत्ताकार योजना में केंद्र व निरंतरता, त्रिकोणीय योजना में दिशा व बहुध्रुवीयता
वृत्त और त्रिकोण का अंतर

शास्त्र त्रिकोणीय भूखंड पर क्या कहता है

यहाँ सावधानी ज़रूरी है, क्योंकि इस विषय पर बहुत कुछ ग़लत प्रचारित है।

वराहमिहिर की बृहत्संहिता के वास्तुविद्या अध्याय में भूमि की आकृति पर जो कहा गया है, वह श्लोक 115–116 में मिलता है: विषम आकृति की भूमि और असमान भुजाओं को दोषपूर्ण बताया गया है, और भूमि को चारों ओर से समान रखने की सलाह दी गई है। ध्यान दीजिए — वहाँ “त्रिकोण” शब्द नहीं है। दोष विषमता का बताया गया है, तीन भुजाओं का नहीं।

इसलिए “शास्त्र त्रिकोणीय भूखंड को वर्जित करता है” — यह वाक्य जितनी आसानी से कहा जाता है, उतनी आसानी से सिद्ध नहीं होता। परवर्ती वास्तु-परंपरा में त्रिकोणीय भूखंड को लेकर सावधानी अवश्य मिलती है, पर उसे बृहत्संहिता के नाम पर कहना ठीक नहीं। जो स्रोत मैंने देखे हैं वे नीचे संदर्भ में दिए हैं; कोई पाठक इससे भिन्न प्रमाण रखता हो तो मुझे पढ़ने में रुचि होगी।

आकृति बदली, प्रश्न बदला — 2014, 2019 और 2024 की सीट-संख्या की समयरेखा; नीचे लिखा कि यह निष्कर्ष नहीं, विचार का विषय है
आकृति बदली, प्रश्न बदला

2014 से 2024 तक: घटनाक्रम

2014 में भाजपा को 282 सीटें मिलीं, 2019 में 303 और 2024 में 240। 2024 में पार्टी अपने बल पर 272 के आँकड़े तक नहीं पहुँची, पर राजग ने सरकार बना ली।

यह घटनाक्रम है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि सीटों का उतार-चढ़ाव नई संसद की आकृति के कारण हुआ। किसी घटना का किसी दूसरी घटना के बाद घटित होना, उसका कारण होने का प्रमाण नहीं है।

एक प्रतीकात्मक समानांतर ज़रूर दिखता है, और उसे उसी सीमा में रखा जाना चाहिए। पुरानी संसद के अंतिम पूर्ण चरण में एक दल का स्पष्ट बहुमत था; नई संसद की पहली निर्वाचित लोकसभा में सत्ता गठबंधन पर निर्भर हुई और विपक्ष मज़बूत हुआ। एक केंद्र से अनेक ध्रुवों की ओर बढ़ता यह चित्र, गोल से षट्भुज की ओर हुए स्थापत्य परिवर्तन के साथ रखकर देखने पर दिलचस्प लगता है।

दिलचस्प — इससे आगे कुछ नहीं।

आकृति का संदेश — वृत्त, केंद्र, त्रिकोण और दिशा; पुरानी संसद वृत्ताकार व केंद्रित, नई संसद त्रिकोणाकार व दिशात्मक
आकृति का संदेश — भाग 1

असली सवाल कहीं और हैं

भाजपा के सामने गठबंधन का संतुलन है, राज्यों में प्रदर्शन है, अर्थव्यवस्था और रोज़गार हैं, सहयोगियों से रिश्ते हैं। कांग्रेस के सामने यह चुनौती है कि 2024 की बढ़त को संगठन, राज्य नेतृत्व और टिकाऊ मतदाता आधार में कैसे बदला जाए। क्षेत्रीय दल तीसरे शक्ति-बिंदु बने हुए हैं।

इनमें से किसी का उत्तर किसी इमारत के नक़्शे में नहीं मिलेगा।

और जो काम अब तक किसी ने नहीं किया

जब मैं किसी स्थल पर पहुँचता हूँ तो सबसे पहले भवन नहीं देखता। पहले देखता हूँ कि वह सामने से कैसा दिखता है, उसके दाएँ क्या है, बाएँ क्या है, पीछे क्या है, वह चारों ओर से खुला है या घिरा हुआ। परिवेश पहले, भवन बाद में। यह मेरी अपनी सनक नहीं है — बृहत्संहिता स्वयं द्वार के सामने की स्थिति, आसपास के भवनों और चौराहों पर कई श्लोक ख़र्च करती है।

नई संसद पर अब तक जो भी लिखा गया, वह आकृति पर लिखा गया। परिवेश पर किसी ने काम नहीं किया — उसके दाएँ-बाएँ क्या पड़ता है, वह किस ओर मुँह करती है, पुराना भवन उसके सापेक्ष कहाँ बैठता है, वह खुली है या घिरी हुई।

यह काम अभी बाक़ी है, और यह स्थल पर जाकर, वास्तविक उत्तर नापकर तथा विस्तृत नक़्शा-अध्ययन के बाद ही हो सकता है। उससे पहले जो भी कहा जाएगा — मेरे द्वारा भी — वह अनुमान रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नया संसद भवन क्या सचमुच त्रिकोण है?

ज्यामिति की दृष्टि से नहीं। तीनों कोने तराशे गए हैं, और हर तराशा हुआ कोना दो नए कोने बनाता है। इसलिए परिणामी आकृति तीन कोनों वाली नहीं, छह कोनों वाली है — त्रिभुज नहीं, षट्भुज।

क्या कोने काट देने से त्रिकोण-दोष मिट जाता है?

यह तर्क आम है, पर गिनती इसके उलट है। एक कोना काटने पर एक कोना जाता है और दो बनते हैं। तीन कोने काटने पर तीन गए, छह आए। कोने मिटे नहीं, बढ़ गए — बस कम दिखाई देते हैं।

क्या पुरानी संसद भी त्रिकोणीय ज़मीन पर बनी थी?

हाँ, और यही इस पूरी बहस का सबसे अनदेखा तथ्य है। नॉर्थ ब्लॉक के नीचे जो भूखंड चुना गया वह त्रिकोणीय था। हर्बर्ट बेकर ने उस पर वृत्त बैठा दिया। सौ साल बाद उसी तरह के भूखंड पर बिमल पटेल ने त्रिकोण ही रखा।

बेकर ने गोल आकार क्यों चुना?

दो कारण दर्ज हैं। त्रिकोणीय ज़मीन पर वृत्त से जगह का उपयोग बेहतर होता था। और भीतर उन्होंने अर्धवृत्ताकार सदन-कक्ष रखे, यह मानते हुए कि आमने-सामने बैठाने वाला आयताकार ब्रिटिश ढंग दो-दलीय टकराव और साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा सकता है।

क्या शास्त्र त्रिकोणीय भूखंड को वर्जित करता है?

यह वाक्य जितनी आसानी से कहा जाता है उतनी आसानी से सिद्ध नहीं होता। बृहत्संहिता के वास्तुविद्या अध्याय में विषम आकृति और असमान भुजाओं को दोष कहा गया है — “त्रिकोण” शब्द वहाँ नहीं आता। परवर्ती परंपरा में सावधानी मिलती है, पर उसे बृहत्संहिता के नाम पर कहना ठीक नहीं।

2014, 2019 और 2024 में भाजपा को कितनी सीटें मिलीं?

282, 303 और 240। 2024 में पार्टी अपने बल पर 272 तक नहीं पहुँची, पर राजग ने सरकार बनाई।

क्या संसद की आकृति से चुनाव का नतीजा बदलता है?

नहीं।

तो ये आँकड़े लेख में क्यों हैं?

क्योंकि यही वह घटनाक्रम है जिसे लोग नई संसद से जोड़कर पूछते हैं। इन्हें रखा गया है ताकि क्रम साफ़ दिखे — और यह भी साफ़ रहे कि क्रम कारण नहीं होता।

नई संसद कब बनकर तैयार हुई और कितनी बड़ी है?

निर्माण 20 मई 2023 को पूरा हुआ, उद्घाटन 28 मई 2023 को। भूखंड लगभग 64,500 वर्ग मीटर, निर्मित क्षेत्र लगभग 20,866 वर्ग मीटर, चार मंज़िलें। वास्तुकार बिमल पटेल, फ़र्म HCP Design।

पुरानी संसद के बारे में मुख्य तथ्य क्या हैं?

एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर की योजना, उद्घाटन जनवरी 1927, व्यास 560 फुट, पहली मंज़िल पर 144 स्तंभों की खुली परिक्रमा।

इस विषय पर अभी कौन-सा काम बाक़ी है?

परिवेश का अध्ययन। नई संसद के दाएँ-बाएँ क्या है, वह किस ओर मुँह करती है, पुराना भवन उसके सापेक्ष कहाँ है, वह खुली है या घिरी हुई — यह किसी ने नहीं देखा। और यह स्थल पर वास्तविक उत्तर नापे बिना नहीं हो सकता।

क्या इस लेख में किसी दल के भविष्य की भविष्यवाणी है?

नहीं। किसी दल के भविष्य पर कोई दावा इसमें नहीं है।

इसी श्रृंखला में

संदर्भ

प्राथमिक स्रोत (संस्कृत ग्रंथ)

  • वराहमिहिर, बृहत्संहिता — वास्तुविद्या अध्याय। संस्कृत संस्करण में यह अध्याय 52 है; एन. चिदंबरम अय्यर के अंग्रेज़ी अनुवाद में इसकी संख्या 53 है। विशेष रूप से श्लोक 42 (81 पद विभाजन), 57–58 (मर्मस्थल), 63–64 (वंश रेखाएँ एवं अतिमर्म), 66 (ब्रह्मस्थान), 76–78 तथा 89–90 (द्वार के सामने एवं आसपास की स्थिति), 115–116 (भूमि की विषम आकृति एवं समतल)।

अनुवाद

आधुनिक स्रोत

वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन
औद्योगिक व आवासीय वास्तु सलाहकार और शोधकर्ता

वास्तुविद् सुनील कुमार आर्यन
✍️ लेखक परिचय
वास्तुविद् सुनील कुमार आर्यन
संस्थापक, VASTU CLASS
आवासीय एवं औद्योगिक वास्तु विशेषज्ञ, प्रशिक्षक एवं वास्तु तकनीक शोधकर्ता
लेखक का परिचय

वास्तुविद् सुनील कुमार आर्यन

संस्थापक — VASTU CLASS एवं श्री नवग्रह वाटिका, पानीपत। आवासीय एवं औद्योगिक वास्तु विशेषज्ञ, प्रशिक्षक एवं वास्तु तकनीक शोधकर्ता।

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