शोध-श्रृंखला: भाग 1 — संसद की आकृति और राजनीति · भाग 2 — वृत्त और त्रिकोण की ऊर्जा · भाग 3 — सत्ता का धर्म

“ऊर्जा” वास्तु की बातचीत में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला और सबसे कम स्पष्ट शब्द है।
कोई कहता है गोल भवन में ऊर्जा अच्छी रहती है — किस ऊर्जा की बात हो रही है? धूप और हवा की? भीतर चलने-फिरने वाले लोगों के अनुभव की? या शास्त्र में वर्णित दिशा-ऊर्जा की? ये तीन अलग चीज़ें हैं, और इन्हें आपस में मिला देना ही अधिकांश भ्रम की जड़ है।
तीन अलग अर्थ, तीन अलग खाने
पहला — भौतिक ऊर्जा। सूर्य, ताप, प्रकाश, हवा, ध्वनि, कंपन। ये नापे जा सकते हैं। इनके यंत्र हैं, इकाइयाँ हैं, और कोई भी दोबारा नापकर जाँच सकता है।
दूसरा — स्थान का मानवीय प्रभाव। लोग भवन में कैसे चलते हैं, एक-दूसरे को कितना देख पाते हैं, भीड़ कहाँ बनती है, बातचीत कहाँ होती है। यह भी देखा और दर्ज किया जा सकता है।
तीसरा — वास्तुशास्त्रीय ऊर्जा। दिशा, ब्रह्मस्थान, देवता-पद, भूमि, द्वार, भार और रिक्तता से जुड़ी पारंपरिक व्याख्या।
इनमें से किसी एक को दूसरे का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। धूप का गणित शास्त्र को सिद्ध नहीं करता, और शास्त्र की बात धूप के गणित की जगह नहीं ले सकती। मैं तीनों को साथ रखता हूँ, पर अलग-अलग।

मैं किसी स्थल पर पहुँचकर पहले क्या देखता हूँ
पहले भवन नहीं।
पहले यह — सामने से पहली नज़र में वह कैसा लगता है। उसके दाएँ क्या है, बाएँ क्या है, पीछे क्या है। वह चारों ओर से खुला है या किसी ओर से घिरा हुआ। सामने सड़क आकर टकरा रही है या किनारे से निकल रही है। परिवेश पहले, भवन बाद में।
यह क्रम मैंने अपनी सुविधा से नहीं बनाया। बृहत्संहिता का वास्तुविद्या अध्याय द्वार के ठीक सामने पड़ने वाली वस्तुओं पर पूरे श्लोक ख़र्च करता है — सड़क, वृक्ष, चौराहा, कुआँ, स्तंभ, नाली। और आगे यह भी कि पड़ोस में क्या है, कहाँ चार सड़कें मिलती हैं। शास्त्र स्वयं भवन से पहले उसके चारों ओर देखता है।
व्यवहार में इसका असर यह होता है कि कई बार क्लाइंट को बोलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती — हम ही अपना आकलन बताना शुरू कर देते हैं, और उसकी हाँ निकलती रहती है। इसमें कोई चमत्कार नहीं है। परिवेश पहले ही बहुत कुछ बता चुका होता है; बस उसे पढ़ना आना चाहिए।

गोल और तिकोने का बुनियादी फ़र्क़
वृत्त में हर बाहरी बिंदु केंद्र से बराबर दूरी पर होता है। कोई स्वाभाविक कोना नहीं होता, इसलिए वह निरंतरता और केंद्रीयता का बोध देता है।
त्रिकोण में तीन शीर्ष होते हैं और एक स्पष्ट दिशा-बोध।
पर नई संसद के मामले में यह वर्णन ही अधूरा है, और यह बात भाग 1 में विस्तार से रखी गई है। वहाँ तीनों कोने तराशे गए हैं। कोना तराशने पर एक कोना जाता है और उसकी जगह दो बनते हैं। तीन कोनों पर यही करने से तीन गए और छह आए। इसलिए जिस भवन को हम “त्रिकोणीय” कहकर तुलना कर रहे हैं, वह ज्यामिति की भाषा में षट्भुज है। वास्तु का कोई भी गंभीर विश्लेषण छह भुजाओं की आकृति पर होना चाहिए, तीन भुजाओं की पर नहीं।
यही गिनती ऊपर के चित्र में देखी जा सकती है; विस्तृत तर्क भाग 1 में है।

श्रीयंत्र का सवाल
अब उस बिंदु पर, जो मेरी दृष्टि में इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
नई संसद के पक्ष में यह तर्क सार्वजनिक रूप से दिया गया है कि भारतीय परंपरा में त्रिकोण पवित्र माना गया है, और इस संदर्भ में श्रीयंत्र का नाम लिया गया है।
यहाँ रुककर देखना चाहिए कि श्रीयंत्र में त्रिकोण होता कैसे है।
श्रीयंत्र में त्रिकोण कभी अकेला नहीं होता। वहाँ ऊर्ध्वमुखी और अधोमुखी त्रिकोण एक-दूसरे में प्रविष्ट हैं — शिव और शक्ति, पुरुष और प्रकृति। यही अंतर्भेदन उस यंत्र का प्राण है। और जब एक ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण एक अधोमुखी त्रिकोण को काटता है, तो जो आकृति बनती है वह षट्कोण है।
तो प्रश्न अपने आप खड़ा हो जाता है — यदि प्रेरणा श्रीयंत्र है, तो दूसरा, संतुलनकारी त्रिकोण कहाँ है?
यह राजनीतिक प्रश्न नहीं है। यह शास्त्रीय प्रश्न है, और इसका उत्तर उन्हीं से आना चाहिए जिन्होंने श्रीयंत्र का नाम लिया। अकेला त्रिकोण श्रीयंत्र नहीं होता। श्रीयंत्र में अकेलापन है ही नहीं — वहाँ हर त्रिकोण किसी दूसरे के साथ संबंध में है।

धूप
बराबर क्षेत्रफल में वृत्त सबसे सघन घेरा देता है। भवन के बाहरी आवरण का असर होता है, पर भीतर कितनी गर्मी रहेगी यह अकेले आकृति से तय नहीं होता — अग्रभाग की बनावट, काँच का काम, दीवारों का इन्सुलेशन, भीतरी आँगन, ऊँचाई और दिशा-निर्धारण, सब मिलकर तय करते हैं।
एक फ़र्क़ ज़रूर है। गोल भवन का अग्रभाग हर कोण पर लगातार दिशा बदलता रहता है, इसलिए धूप उस पर बँटकर पड़ती है। कोण वाले भवन में बड़ी सपाट दीवारें एक ही दिशा की ओर हो सकती हैं, जिससे सौर ताप-लाभ किसी एक मुख पर केंद्रित हो जाता है। वहाँ छाया की व्यवस्था अलग से सोचनी पड़ती है।

हवा
घुमावदार और कोण वाले आकारों के आसपास हवा का बहाव अलग-अलग होता है। पर किसी भवन में हवा वास्तव में कैसे चलेगी, यह खिड़की-दरवाज़ों की स्थिति, उस क्षेत्र की मुख्य हवा की दिशा और वायु-प्रवाह के कंप्यूटर विश्लेषण से पता चलता है। आकृति एक कारक है, अकेला कारक नहीं।

आवाज़
घुमावदार सतहें ध्वनि को एक तरह लौटाती हैं, कोण वाली दूसरी तरह। संसद में यह छोटी बात नहीं — वहाँ का पूरा काम बोलने और सुने जाने पर टिका है। सभा-कक्ष की बनावट, छत की ऊँचाई और ध्वनि-उपचार मिलकर तय करते हैं कि बोला हुआ शब्द स्पष्ट पहुँचेगा या गूँज में खो जाएगा।
यहाँ एक बात याद रखने लायक़ है। बेकर ने 1920 के दशक में तीनों कक्ष अर्धवृत्ताकार रखे थे, और उनका तर्क ध्वनि का नहीं, राजनीतिक व्यवहार का था। बैठने की ज्यामिति बहस के स्वभाव को बदल देती है — यह मान्यता वहाँ भी थी।

ब्रह्मस्थान: वह जगह जहाँ त्रिकोण सबसे कठिन हो जाता है
वास्तु की दृष्टि से असली सवाल यह है कि इन आकृतियों पर वास्तुपुरुष मंडल बैठाया कैसे जाएगा।
बृहत्संहिता में भूमि को 81 पदों में बाँटा जाता है — 32 देवता बाहरी पदों पर और 13 भीतरी पदों पर, बीच के नौ पद ब्रह्मा के। उसी अध्याय में कहा गया है कि गृहस्वामी ब्रह्मा के भाग की विशेष रक्षा करे; वह भाग दूषित हुआ तो कष्ट आता है। मर्मस्थलों पर स्तंभ या कील नहीं पड़नी चाहिए। छह वंश-रेखाएँ आपस में नौ बिंदुओं पर कटती हैं, जिन्हें अतिमर्म कहा गया है। इस पूरी पद्धति को मैंने सूत्र-रेखाओं वाले लेख में विस्तार से खोला है।
वृत्त में यह काम सीधा है। उसका केंद्र एक ही होता है और स्पष्ट होता है।
त्रिकोण में यही सबसे पेचीदा हिस्सा है। वहाँ केंद्रक (centroid), अंतःकेंद्र, परिकेंद्र और लंबकेंद्र — चार अलग-अलग “केंद्र” निकलते हैं, और समबाहु त्रिभुज को छोड़कर ये एक बिंदु पर नहीं मिलते। ब्रह्मस्थान किसे माना जाए, यह अपने आप में एक निर्णय बन जाता है। और जब आकृति षट्भुज हो, तब यह प्रश्न और खुल जाता है।
यह कोई छोटी तकनीकी बात नहीं है। जिस बिंदु की शास्त्र सबसे अधिक रक्षा करने को कहता है, उसी बिंदु का निर्धारण यहाँ विवादास्पद हो जाता है।
जो नहीं कहा जा सकता
सूर्य का विद्युत-चुंबकीय विकिरण, पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण और भू-चुंबकीय क्षेत्र, ताप, हवा, प्रकाश, ध्वनि — ये नापी जा सकने वाली चीज़ें हैं।
पर स्थापित भौतिकी में ऐसा कोई नियम नहीं है जो कहता हो कि त्रिकोण ब्रह्मांडीय ऊर्जा को तीन हिस्सों में काट देता है, या वृत्त उसे अपने आप जमा कर लेता है। मैंने यह कहते बहुत लोगों को सुना है। प्रमाण किसी के पास नहीं है।
इतना कहा जा सकता है — वृत्त केंद्रीयता, निरंतरता और चारों ओर एक-सी बनावट देता है; कोण वाली आकृति दिशा-बोध और शक्ति-बिंदुओं का क्रम देती है। इससे आगे बढ़ने के लिए दोनों भवनों को एक ही पैमाने पर, वास्तविक उत्तर के साथ, 32 पदों, ब्रह्मस्थान, प्रवेश, निर्मित भाग, खुली जगह और मुख्य कक्षों सहित — और परिवेश सहित — रखकर देखना होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वास्तु में “ऊर्जा” का मतलब क्या होता है?
कम से कम तीन अलग चीज़ें — नापी जा सकने वाली भौतिक ऊर्जा, स्थान का मानवीय प्रभाव, और शास्त्रोक्त दिशा-ऊर्जा। तीनों को एक मान लेना ही सबसे बड़ी ग़लती है।
श्रीयंत्र वाला तर्क कमज़ोर क्यों है?
क्योंकि श्रीयंत्र में त्रिकोण कभी अकेला नहीं होता। वहाँ ऊर्ध्वमुखी और अधोमुखी त्रिकोण एक-दूसरे में प्रविष्ट रहते हैं, और उनके कटान से षट्कोण बनता है। यदि प्रेरणा श्रीयंत्र है तो प्रश्न बनता है कि दूसरा, संतुलनकारी त्रिकोण कहाँ है।
षट्कोण क्या होता है?
ऊर्ध्वमुखी और अधोमुखी त्रिकोण के परस्पर कटान से बनने वाली छह-कोण आकृति। भारतीय यंत्र-परंपरा में यह शिव और शक्ति के संयोग का प्रतीक मानी जाती है।
तो नई संसद की आकृति को त्रिकोण कहना ठीक है?
ज्यामिति की दृष्टि से नहीं। तीनों कोने तराशे जाने के बाद वह छह कोनों वाली आकृति है। गंभीर वास्तु विश्लेषण षट्भुज पर होना चाहिए।
आप किसी स्थल पर सबसे पहले क्या देखते हैं?
भवन नहीं — परिवेश। सामने से पहली नज़र, दाएँ-बाएँ क्या है, पीछे क्या है, चारों ओर से खुला है या घिरा हुआ। बृहत्संहिता स्वयं द्वार के सामने की स्थिति और पड़ोस पर कई श्लोक देती है।
क्या गोल भवन तिकोने से ज़्यादा ठंडा रहता है?
ज़रूरी नहीं। वृत्त सघन घेरा देता है, पर भीतर की गर्मी अग्रभाग, काँच, इन्सुलेशन, आँगन, ऊँचाई और दिशा से तय होती है।
त्रिकोण में ब्रह्मस्थान तय करना कठिन क्यों है?
क्योंकि त्रिकोण का एक केंद्र नहीं होता। केंद्रक, अंतःकेंद्र, परिकेंद्र और लंबकेंद्र — चार अलग बिंदु निकलते हैं और समबाहु त्रिभुज को छोड़कर वे एक जगह नहीं मिलते। जिस बिंदु की शास्त्र सबसे अधिक रक्षा कहता है, उसी का निर्धारण विवादास्पद हो जाता है।
बृहत्संहिता ब्रह्मस्थान के बारे में क्या कहती है?
कि गृहस्वामी ब्रह्मा के भाग की विशेष रक्षा करे, और वह भाग दूषित हुआ तो कष्ट आता है। मर्मस्थलों पर स्तंभ या कील नहीं पड़नी चाहिए।
क्या त्रिकोण ब्रह्मांडीय ऊर्जा को काट देता है?
स्थापित भौतिकी में ऐसा कोई नियम नहीं है। यह बात कही बहुत जाती है, प्रमाण किसी के पास नहीं।
क्या विज्ञान वास्तु को ग़लत ठहराता है?
यह लेख ऐसा नहीं कहता। यह कहता है कि दोनों के दावे अलग तरह के हैं, और एक को दूसरे का प्रमाण बनाकर पेश करना ठीक नहीं।
संसद जैसे भवन में आवाज़ का सवाल क्यों अहम है?
क्योंकि वहाँ का पूरा काम बोलने और सुने जाने पर टिका है। कक्ष की बनावट, छत और ध्वनि-उपचार मिलकर स्पष्टता तय करते हैं।
इसी श्रृंखला में
- भाग 1 — नई संसद की त्रिकोणीय वास्तु-योजना और भारत की राजनीति
- भाग 3 — वृत्त, त्रिकोण और सत्ता का धर्म
- वास्तुपुरुष मंडल की सूत्र-रेखाओं का गूढ़ विज्ञान
संदर्भ
प्राथमिक स्रोत (संस्कृत ग्रंथ)
- वराहमिहिर, बृहत्संहिता — वास्तुविद्या अध्याय। संस्कृत संस्करण में यह अध्याय 52 है; एन. चिदंबरम अय्यर के अंग्रेज़ी अनुवाद में इसकी संख्या 53 है। विशेष रूप से श्लोक 42 (81 पद विभाजन), 57–58 (मर्मस्थल), 63–64 (वंश रेखाएँ एवं अतिमर्म), 66 (ब्रह्मस्थान), 76–78 तथा 89–90 (द्वार के सामने एवं आसपास की स्थिति), 115–116 (भूमि की विषम आकृति एवं समतल)।
अनुवाद
- N. Chidambaram Iyer, The Bṛhat Saṃhitā of Varāha Mihira (1884), पुनर्मुद्रण मोतीलाल बनारसीदास — अध्याय 53: On House-building (vāstu-vidyā)।
आधुनिक स्रोत
- Parliament House, New Delhi — भूखंड 64,500 वर्ग मीटर, निर्मित क्षेत्र 20,866 वर्ग मीटर, चार मंज़िलें, निर्माण पूर्ण 20 मई 2023, उद्घाटन 28 मई 2023।
- Old Parliament House, New Delhi — एडविन लुटियंस एवं हर्बर्ट बेकर, उद्घाटन जनवरी 1927।
- “Journey of the old Parliament building since its inauguration in 1927”, Business Standard, 26 मई 2023 — व्यास 560 फुट, 144 स्तंभों की परिक्रमा।
- “Does India need a new Parliament building? History may have some constructive criticism”, Scroll.in — त्रिकोणीय भूखंड पर वृत्ताकार योजना का निर्णय एवं अर्धवृत्ताकार सदन-कक्षों का तर्क।
- New Building for the Parliament of India / HCP Design, Planning and Management, ArchDaily।
- श्रीयंत्र एवं षट्कोण की संरचना पर पारंपरिक तंत्र-साहित्य; इस लेख में केवल यंत्र की सामान्य संरचना का उल्लेख है, किसी विशेष साधना-पद्धति का नहीं।
वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन
औद्योगिक व आवासीय वास्तु सलाहकार और शोधकर्ता


