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वृत्त, त्रिकोण और सत्ता का धर्म (भाग 3)

शोध-श्रृंखला: भाग 1 — संसद की आकृति और राजनीति  ·  भाग 2 — वृत्त और त्रिकोण की ऊर्जा  ·  भाग 3 — सत्ता का धर्म

भाग 3 का आवरण — सत्य, अहिंसा और सत्ता का धर्म: केंद्र, नैतिकता और लोकतंत्र; वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन के साथ संविधान और संसद
सत्य, अहिंसा और सत्ता का धर्म — भाग 3

अब उस सवाल पर, जिससे यह श्रृंखला शुरू हुई थी — क्या किसी सत्ता-स्थल की बनावट उस सत्ता के स्वभाव का प्रतीक बन सकती है?

एक बात पहले

“वृत्त यानी सत्य और अहिंसा” तथा “त्रिकोण यानी हिंसा और अधर्म” — ऐसा कोई शास्त्रीय विधान नहीं है। किसी ग्रंथ में यह नहीं लिखा। जो आगे लिखा है वह नैतिक सिद्धांत, ज्यामिति और वास्तु-व्यवहार के बीच का एक दार्शनिक संवाद है, विधान नहीं।

यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी था, क्योंकि इस तरह के समीकरण बाज़ार में बहुत बिकते हैं। कोई भी आकृति अपने आप न पुण्य कमाती है, न पाप।

आकृति और सत्ता की मनोवृत्ति — वृत्त के भीतर पुरानी संसद (केंद्र, एकाधिकार?) और त्रिकोण के भीतर नई संसद (शक्ति-बिंदु, ध्रुवीकरण?)
आकृति और सत्ता की मनोवृत्ति

राजधर्म

भारतीय परंपरा में सत्य, अहिंसा, अक्रोध, संयम, दया और अलोलुपता को ऊँचे नैतिक गुण माना गया है। राजधर्म के संदर्भ में इसका सीधा अर्थ यह है कि सत्ता केवल शक्ति नहीं होती। वह उत्तरदायित्व भी होती है, और संयम भी।

यह बात जितनी सरल दिखती है, व्यवहार में उतनी ही कठिन है — और यह किसी एक दल या किसी एक दौर की बात नहीं।

संसद का वास्तविक केंद्र — भारत के संविधान की पुस्तक के साथ दोनों संसद भवन; नीचे लिखा कि आकृति बदल सकती है, केंद्र नहीं
संसद का वास्तविक केंद्र

वृत्त का केंद्र

वृत्त का एक केंद्र होता है और परिधि के सारे बिंदु उससे बराबर दूरी पर। प्रतीक के रूप में यह एकता दिखा सकता है, निरंतरता दिखा सकता है।

पर उसी बनावट में दो बिलकुल उलटी संभावनाएँ पढ़ी जा सकती हैं — केंद्रीय समन्वय, और केंद्रीय एकाधिकार।

वृत्त स्वयं एकाधिकार नहीं है। वह एक शक्तिशाली केंद्र देता है, बस इतना। वह केंद्र समन्वय बनेगा या नियंत्रण, यह उसकी ज्यामिति नहीं, उसके भीतर बैठे मनुष्यों का चरित्र तय करता है।

अगर केंद्र में सत्य, संविधान और जनहित हों, तो वही बिंदु पूरे ढाँचे का संतुलन बन जाता है। अगर वहाँ केवल अपनी कुर्सी बचाने की चिंता आ बैठे, तो वही बनावट अत्यधिक केंद्रीकरण का प्रतीक बन जाती है। बनावट वही रहती है; अर्थ बदल जाता है।

ध्यान दीजिए, यह भवन का दोष नहीं है। दीवारें किसी को कुछ नहीं करातीं।

आकृति से आगे — आचरण; सत्य, अहिंसा और धर्म के प्रतीकों के साथ दोनों संसद भवन, यह संदेश कि वृत्त हो या त्रिकोण, लोकतंत्र का प्राण मर्यादा है
आकृति से आगे — आचरण

अहिंसा का संसदीय अर्थ

सदन में अहिंसा का मतलब क्या होगा?

शायद यह — विरोधी की बात पूरी सुनना। व्यक्तिगत अपमान की जगह तर्क रखना। संख्या के बल पर असहमति को मिटा न देना। और शक्ति के साथ संयम बनाए रखना।

पत्थर अहिंसक नहीं होता। मनुष्य अहिंसक होता है।

यहाँ एक ऐतिहासिक ब्योरा याद आता है। जैसा भाग 1 में लिखा है, हर्बर्ट बेकर ने 1920 के दशक में तीनों कक्ष अर्धवृत्ताकार रखे थे, इस तर्क के साथ कि आमने-सामने बैठाने वाला आयताकार ब्रिटिश ढंग दो-दलीय टकराव को बढ़ावा देता है। यानी बैठने की ज्यामिति और बहस के स्वभाव का रिश्ता सौ साल पहले भी माना गया था। यह वास्तु का दावा नहीं, स्थापत्य के इतिहास में दर्ज बात है।

संसद, सत्य और धर्म — संविधान, अशोक स्तंभ और शांति के प्रतीकों के साथ वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन
संसद, सत्य और धर्म

त्रिकोण के तीन बिंदु

त्रिकोण में तीन शीर्ष हैं। प्रतीक के तौर पर यह अनेक शक्ति-केंद्रों को दिखा सकता है।

पर अनेक केंद्र होने भर से लोकतंत्र नहीं बन जाता। तीन शक्ति-केंद्र संतुलन भी बना सकते हैं और आपस में टकरा भी सकते हैं। आधुनिक रूपक में इन्हें सत्ता, विपक्ष और जनता या संविधान के रूप में पढ़ा जा सकता है — यह मेरा पाठ है, कोई शास्त्रीय वास्तु-विधान नहीं।

और यहाँ वह बात दोहरा देना ज़रूरी है जो भाग 2 में विस्तार से रखी गई है। नई संसद के तीनों कोने तराशे हुए हैं, इसलिए वह ज्यामिति की भाषा में तीन कोनों की नहीं, छह कोनों की आकृति है। जो लोग “तीन शक्ति-बिंदु” का रूपक चलाते हैं, उन्हें पहले यह तय करना होगा कि वे किस आकृति की बात कर रहे हैं।

इसी तरह, नई संसद के तराशे हुए कोनों पर कोई फलादेश देने से पहले वास्तविक उत्तर और असली वास्तु-पद देखने पड़ेंगे। “तीन कटे कोने यानी सत्य, धर्म और धन का कटाव” — इस तरह की घोषणा बिना प्रमाण के करना ग़लत होगा। मैं नहीं करूँगा।

सत्ता से ऊपर आचरण — सत्य, अहिंसा और धर्म के तीन प्रतीक तथा दोनों संसद भवन; तीन-भाग संसद शृंखला
सत्ता से ऊपर आचरण

दोनों की अपनी-अपनी विकृति

प्रतीक के स्तर पर वृत्त की संभावित विकृति है अत्यधिक केंद्रीकरण, और कोण वाली आकृति की संभावित विकृति है अत्यधिक ध्रुवीकरण।

आदर्श शायद बीच में कहीं है — केंद्र हो, पर एकाधिकार न हो; अनेक शक्ति-बिंदु हों, पर बिखराव न हो; विरोध हो, पर हिंसा न हो; सत्ता हो, पर सत्य से ऊपर न हो।

और यह भी कहना चाहिए कि किसी भी दल या सरकार का आचरण उस भवन से नहीं आता जिसमें वह बैठती है। वह आचरण से आता है। इमारत पर दोष डालना, दरअसल, मनुष्य को बरी कर देना है।

लोकतंत्र का वास्तविक केंद्र — संविधान, तराजू और अशोक स्तंभ के साथ दोनों संसद भवन; आकृति बदल सकती है, केंद्र नहीं
लोकतंत्र का वास्तविक केंद्र

वह काम जो अब तक किसी ने नहीं किया

दो साल से बहस चल रही है और लगभग पूरी बहस आकृति पर है। गोल था, तिकोना है, कोने कटे हैं, नहीं कटे हैं।

परिवेश पर किसी ने काम नहीं किया।

नई संसद के दाएँ क्या पड़ता है और बाएँ क्या। वह किस दिशा में मुँह करती है। पुराना भवन उसके सापेक्ष कहाँ बैठता है — सामने, बग़ल में, या पीछे। वह चारों ओर से खुली है या किसी ओर से घिरी हुई। प्रवेश के ठीक सामने क्या है।

मेरी अपनी पद्धति में यही पहला चरण है, और जैसा भाग 2 में लिखा है, बृहत्संहिता स्वयं द्वार के सामने की स्थिति और पड़ोस पर कई श्लोक ख़र्च करती है। जिस विषय पर शास्त्र इतना कहता है, उसी पर इस बहस में कुछ नहीं कहा गया।

यह काम स्थल पर जाकर, वास्तविक उत्तर नापकर और विस्तृत नक़्शा-अध्ययन के बाद ही हो सकता है। उससे पहले जो कहा जाएगा — मेरे द्वारा भी — वह अनुमान रहेगा, निष्कर्ष नहीं।

सत्ता से ऊपर मर्यादा — लोकतंत्र का प्राण आचरण; वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन के साथ अशोक स्तंभ और नई संसद
सत्ता से ऊपर मर्यादा

ऐसा अध्ययन दिखता कैसा है

पाठक पूछ सकते हैं कि परिवेश का अध्ययन कहने में तो अच्छा लगता है, होता क्या है। संक्षेप में यह।

सबसे पहले वास्तविक उत्तर, चुंबकीय उत्तर नहीं। दोनों में कुछ अंश का अंतर होता है और उसी अंतर पर पूरा पद-विन्यास खिसक जाता है। इसके बाद भूखंड की वास्तविक सीमा और उस पर बने हिस्से का फैलाव — कहाँ भार है, कहाँ खुलापन।

फिर आसपास। किस दिशा में क्या भवन है और वह कितना ऊँचा है। कौन-सी सड़क कहाँ से आकर किस बिंदु पर टकराती है। कहाँ पानी है, कहाँ ढलान है। कहाँ खुला मैदान है और कहाँ दीवार। प्रवेश के ठीक सामने क्या पड़ता है — बृहत्संहिता इसी बिंदु पर सबसे अधिक कहती है।

इसके बाद भीतर। मुख्य कक्ष किस दिशा में हैं, बैठने की व्यवस्था किस ओर मुँह करती है, केंद्र पर क्या पड़ रहा है, और मर्म स्थानों पर कोई स्तंभ या भारी संरचना तो नहीं आ गई।

यह सब नक़्शे पर नापकर, एक ही पैमाने पर, दोनों भवनों के लिए अलग-अलग करना होता है। तब जाकर तुलना का कोई अर्थ बनता है। इनमें से कुछ भी अब तक सार्वजनिक रूप से नहीं किया गया — न मेरे द्वारा, न किसी और के द्वारा। इसीलिए मैं इस श्रृंखला को निष्कर्ष नहीं, प्रश्न-पत्र कहना पसंद करूँगा।

अंतिम सवाल

संसद का असली नैतिक ब्रह्मस्थान संविधान और जनहित को माना जा सकता है।

तो अंतिम सवाल यह नहीं है कि संसद गोल है या तिकोनी। अंतिम सवाल यह है — उसके केंद्र में क्या है?

स्थान शक्ति को आकार दे सकता है। पर शक्ति को धर्म में बदलने का काम आकृति नहीं करती, मनुष्य का चरित्र करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या शास्त्र में लिखा है कि वृत्त सत्य का और त्रिकोण अधर्म का प्रतीक है?

नहीं। किसी ग्रंथ में ऐसा विधान नहीं है। कोई भी आकृति अपने आप न पुण्य कमाती है, न पाप।

राजधर्म का अर्थ क्या है?

कि सत्ता केवल शक्ति नहीं, उत्तरदायित्व और संयम भी है।

क्या गोल भवन एकाधिकार को जन्म देता है?

नहीं। वृत्त एक मज़बूत केंद्र देता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं। वह केंद्र समन्वय बनेगा या नियंत्रण, यह उसमें बैठे मनुष्यों के चरित्र से तय होता है।

केंद्र में क्या हो तो वह संतुलन बनता है?

सत्य, संविधान और जनहित। जहाँ केंद्र में केवल सत्ता-संरक्षण आ जाए, वहीं वही ढाँचा केंद्रीकरण का प्रतीक बन जाता है। बनावट वही रहती है, अर्थ बदल जाता है।

संसद में अहिंसा का व्यावहारिक मतलब क्या होगा?

विरोधी की बात पूरी सुनना, अपमान की जगह तर्क रखना, संख्या-बल से असहमति न मिटाना, और शक्ति के साथ संयम रखना।

क्या भवन स्वयं अहिंसक या हिंसक हो सकता है?

पत्थर अहिंसक नहीं होता। मनुष्य अहिंसक होता है।

क्या पुरानी संसद की गोल बनावट के पीछे कोई राजनीतिक सोच थी?

हाँ, और यह दर्ज है। हर्बर्ट बेकर ने तीनों कक्ष अर्धवृत्ताकार रखे, यह मानते हुए कि आमने-सामने बैठाने वाला आयताकार ब्रिटिश ढंग दो-दलीय टकराव को बढ़ावा देता है।

त्रिकोण के तीन कोने किसका प्रतीक माने जा सकते हैं?

आधुनिक रूपक में सत्ता, विपक्ष और जनता या संविधान। यह लेखक का पाठ है, शास्त्रीय विधान नहीं। और यह ध्यान रहे कि नई संसद की आकृति तराशे जाने के बाद तीन नहीं, छह कोनों की है।

नई संसद के कटे कोनों का क्या फल है?

इस पर कोई फलादेश वास्तविक उत्तर और असली वास्तु-पद देखे बिना नहीं दिया जा सकता। बिना प्रमाण के ऐसी घोषणा करना ग़लत होगा।

इस विषय में अब कौन-सा काम बाक़ी है?

परिवेश का अध्ययन — नई संसद के दाएँ-बाएँ क्या है, वह किस ओर मुँह करती है, पुराना भवन उसके सापेक्ष कहाँ है, प्रवेश के सामने क्या पड़ता है। पूरी बहस आकृति पर हुई है, परिवेश पर नहीं।

इस पूरी श्रृंखला का निचोड़ क्या है?

कि सवाल आकृति का नहीं, केंद्र का है। स्थान शक्ति को आकार दे सकता है, पर उसे धर्म में मनुष्य का चरित्र ही बदलता है।

इसी श्रृंखला में

संदर्भ

प्राथमिक स्रोत (संस्कृत ग्रंथ)

  • वराहमिहिर, बृहत्संहिता — वास्तुविद्या अध्याय। संस्कृत संस्करण में यह अध्याय 52 है; एन. चिदंबरम अय्यर के अंग्रेज़ी अनुवाद में इसकी संख्या 53 है। विशेष रूप से श्लोक 42 (81 पद विभाजन), 57–58 (मर्मस्थल), 63–64 (वंश रेखाएँ एवं अतिमर्म), 66 (ब्रह्मस्थान), 76–78 तथा 89–90 (द्वार के सामने एवं आसपास की स्थिति), 115–116 (भूमि की विषम आकृति एवं समतल)।

अनुवाद

आधुनिक स्रोत

वास्तु विद सुनील कुमार आर्यन
औद्योगिक व आवासीय वास्तु सलाहकार और शोधकर्ता

वास्तुविद् सुनील कुमार आर्यन
✍️ लेखक परिचय
वास्तुविद् सुनील कुमार आर्यन
संस्थापक, VASTU CLASS
आवासीय एवं औद्योगिक वास्तु विशेषज्ञ, प्रशिक्षक एवं वास्तु तकनीक शोधकर्ता
लेखक का परिचय

वास्तुविद् सुनील कुमार आर्यन

संस्थापक — VASTU CLASS एवं श्री नवग्रह वाटिका, पानीपत। आवासीय एवं औद्योगिक वास्तु विशेषज्ञ, प्रशिक्षक एवं वास्तु तकनीक शोधकर्ता।

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